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बुंदेलखंड के गौरव आचार्य दुर्गा चरण शुक्ल का 94 वर्ष की आयु में निधन

बुंदेलखंड के गौरव आचार्य दुर्गा चरण शुक्ल का 94 वर्ष की आयु में निधन

टीकमगढ़, बुंदेलखंड: बुंदेली और हिंदी साहित्य के प्रमुख हस्ताक्षर आचार्य दुर्गा चरण शुक्ल का बुधवार को 94 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उनके निधन से साहित्यिक जगत में एक गहरी शोक की लहर दौड़ गई है। उनका अंतिम संस्कार गुरुवार की सुबह किया जाएगा।

जीवन की शुरुआत और शिक्षा

आचार्य दुर्गा चरण शुक्ल का जन्म 6 नवंबर 1930 को उत्तर प्रदेश के जालौन जिले में हुआ। उन्होंने 1955 में उन्नाव में शिक्षक की नौकरी शुरू की। इसी दौरान वे पीतांबरा पीठ के स्वामी जी के संपर्क में आए, जिससे उनका जीवन एक नई दिशा में मोड़ गया। उन्होंने संस्कृत में MA और M.Ed की डिग्री हासिल की और आचार्य की उपाधि प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने वेदों का अध्ययन शुरू किया।

साहित्यिक यात्रा

उनकी साहित्यिक यात्रा 1960 में उनकी पहली पुस्तक “भाषा में वैज्ञानिक का अध्ययन” के प्रकाशन के साथ शुरू हुई। इसके बाद उन्होंने बुंदेली में लेखन जारी रखा। 1990 में सरकारी नौकरी से सेवानिवृत्त होने के बाद, वे अपने लेखन में और भी सक्रिय हो गए। उनके महत्वपूर्ण कार्यों में “महिला ऋषि का यंत्र” शामिल है, जो भारत में पहली बार प्रकाशित हुआ।

आचार्य शुक्ल को उनके कार्यों के लिए कई सम्मान प्राप्त हुए। 2014 में उन्हें “महर्षि अगस्त अलंकरण” और 2015 में “संस्कृत सम्मान” से नवाजा गया। 2016 में भारत सरकार ने उन्हें “स्वामी विष्णु तीर्थ आध्यात्मिक सम्मान” से सम्मानित किया। हाल ही में, उन्हें 2024 में “हिंदी साहित्य अकादमी सम्मान” देने की घोषणा की गई थी।

हालिया सम्मान

आचार्य दुर्गा चरण शुक्ल का स्वास्थ्य पिछले कुछ समय से ठीक नहीं था, जिसके चलते वे साहित्य अकादमी सम्मान ग्रहण करने के लिए दिल्ली नहीं जा सके। भारत सरकार का एक प्रतिनिधिमंडल हाल ही में टीकमगढ़ पहुंचा था और उन्होंने आचार्य शुक्ल को उनके घर पर सम्मानित किया। यह उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण क्षण था, जो उनके समर्पण और साहित्य के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

विरासत

समाजसेवी मनोज चौबे ने कहा, “आचार्य दुर्गा चरण शुक्ल का योगदान सदैव याद किया जाएगा। उन्होंने संस्कृत वेदों का हिंदी में रूपांतरण करने के साथ-साथ प्रत्येक श्लोक का वर्णन हिंदी और बुंदेली में किया, जो आने वाली पीढ़ी के लिए अमूल्य धरोहर है।” उनके कार्यों ने न केवल साहित्यिक बल्कि सांस्कृतिक धारा को भी समृद्ध किया है।

निष्कर्ष

आचार्य दुर्गा चरण शुक्ल की विदाई ने साहित्यिक जगत को एक अपूरणीय क्षति दी है। उनके योगदान और शिक्षाएं आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा स्रोत रहेंगी। उनके द्वारा लिखी गई पुस्तकें और उनके विचार सदैव समाज में जीवित रहेंगे, जो उन्हें एक महान लेखक और विद्वान के रूप में स्थापित करते हैं। उनका निधन हमें यह याद दिलाता है कि ज्ञान और साहित्य का प्रकाश कभी extinguish नहीं होता, बल्कि वह अगली पीढ़ियों को मार्गदर्शन प्रदान करता है

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