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माता-पिता बच्चों से अच्छा व्यवहार रखें, ताकि वे हर बात साझा कर सकें: प्रभारी कलेक्टर अरजरिया राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग की कार्यशाला सम्पन्न

माता-पिता बच्चों से अच्छा व्यवहार रखें, ताकि वे हर बात साझा कर सकें: प्रभारी कलेक्टर अरजरिया
राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग की कार्यशाला सम्पन्न

छतरपुर। बच्चों की सुरक्षा और अधिकारों को लेकर राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग, नई दिल्ली द्वारा 11 मार्च 2026 को पन्ना रोड स्थित एक निजी होटल में कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला में किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम 2015 तथा पॉक्सो अधिनियम 2012 के संबंध में जागरूकता बढ़ाने और उनके प्रभावी क्रियान्वयन पर चर्चा की गई।

कार्यशाला की अध्यक्षता प्रभारी कलेक्टर एवं जिला पंचायत सीईओ नमः शिवाय अरजरिया ने की। कार्यक्रम का शुभारंभ प्रभारी कलेक्टर तथा जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव विष्णु प्रसाद सोलंकी द्वारा दीप प्रज्वलित कर किया गया।

कार्यक्रम में जिला कार्यक्रम अधिकारी महिला एवं बाल विकास दिनेश दीक्षित, जिला अभियोजन अधिकारी प्रवेश अहिरवार, सहायक जिला अभियोजन अधिकारी हेमंत बजोलिया, जिला चिकित्सालय के मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. आनंद त्रिपाठी सहित शिक्षा, स्वास्थ्य, पुलिस और महिला एवं बाल विकास विभाग के अधिकारी-कर्मचारी मौजूद रहे। इसके अलावा चाइल्ड वेलफेयर कमेटी के सदस्य, चाइल्ड केयर संस्थानों के प्रतिनिधि, शिक्षक और सिविल सोसाइटी संगठनों के सदस्य भी कार्यशाला में शामिल हुए।

कार्यशाला को संबोधित करते हुए प्रभारी कलेक्टर अरजरिया ने कहा कि माता-पिता को बच्चों के प्रति अधिक जागरूक और संवेदनशील होना चाहिए। उन्होंने कहा कि माता-पिता और बच्चों के बीच घनिष्ठ और भरोसेमंद संबंध होना जरूरी है, ताकि यदि कोई बच्चे को धमकाए, ब्लैकमेल करे या किसी प्रकार की प्रताड़ना दे, तो बच्चा बिना झिझक अपने माता-पिता से यह बात साझा कर सके।

उन्होंने कहा कि यदि बच्चे को कोई डराता या परेशान करता है, तो उसका असर उसकी पढ़ाई और मानसिक स्थिति पर पड़ता है। ऐसे बच्चे अक्सर स्कूल जाने से कतराने लगते हैं और उनकी सीखने की क्षमता भी प्रभावित होती है। कई मामलों में बच्चे अवसाद (डिप्रेशन) का शिकार भी हो सकते हैं।

प्रभारी कलेक्टर ने अभिभावकों से अपील करते हुए कहा कि वे अपने बच्चों की आदतों और व्यवहार में आ रहे बदलावों पर ध्यान दें और समय रहते समस्या को समझकर उसका समाधान करें, ताकि बच्चों को सुरक्षित और सकारात्मक वातावरण मिल सके।

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