कृषि अधिकारियों के मुताबिक गर्मियों में खेत की गहराई जुताई करने से मिट्टी की उर्वरा शक्ति बढ़ती है और उत्पादन बढ़ने के साथ-साथ कृषि की लागत में कमी आती है। कृषि अधिकारियों के मुताबिक गर्मी में खेत की गहरी जुताई को ऑफ सीजन जुताई भी कहा जाता है। यह गर्मियों के महीनों में खेत की गहरी जुताई करने की कृषि पद्धति है तथा आमतौर पर रबी की फसल की कटाई के बाद और खरीफ की फसल की बुवाई से पहले की जाती है। यह खेत की मिट्टी को पलटने और ढीला करने का काम करती है। किसान कल्याण तथा कृषि विकास विभाग के अधिकारियों ने गत दिवस पाटन विकासखण्ड के ग्राम ककरहटा में किसानों से गहरी जुताई पर चर्चा की तथा इससे होने वाले फायदे बताये। इन अधिकारियों में जिले के उप संचालक कृषि डॉ एस के निगम, सहायक संचालक कृषि रवि आम्रवंशी एवं अनुविभागीय कृषि अधिकारी पाटन डॉ इंदिरा त्रिपाठी शामिल थे। उप संचालक कृषि डॉ निगम ने किसानों को बताया कि गहरी जुताई से खरपतवार के बीज और राइजोम मिट्टी की सतह पर आ जाते हैं और तेज धूप में सूखकर नष्ट हो जाते हैं। इससे आने वाली खरीफ की फसल में खरपतवारों की समस्या कम हो जाती है और खरपतवारनाशी के उपयोग की आवश्यकता भी कम हो जाती है। उप संचालक कृषि के मुताबिक ग्रीष्मकालीन जुताई मिट्टी में छिपे कीटों के अंडे, लार्वा और प्यूपा को धूप और गर्मी के संपर्क में लाकर नष्ट कर देती है। यह मिट्टी जनित रोगों के रोगजनकों को भी कम करने में मदद करता है, जिससे अगली फसल में कीटों और बीमारियों का खतरा कम हो जाता है। गहरी जुताई से मिट्टी की जल धारण क्षमता बढ़ती है। खुली और ढीली मिट्टी बारिश के पानी को बेहतर ढंग से सोखती है और उसे गहराई तक जाने देती है, जिससे मिट्टी में नमी लंबे समय तक बनी रहती है। यह शुष्क क्षेत्रों और वर्षा आधारित खेती के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। डॉ निगम ने बताया कि गहरी जुताई से मिट्टी की कठोर परत टूट जाती है, जिससे मिट्टी भुरभुरी और हवादार हो जाती है। इससे जड़ों को गहराई तक फैलने में आसानी होती है और पौधों का विकास बेहतर होता है। मिट्टी में हवा का संचार बढ़ने से लाभकारी सूक्ष्मजीवों की गतिविधि भी बढ़ती है। उन्होंने बताया कि गहरी जुताई से कार्बनिक पदार्थ और फसल अवशेष मिट्टी में अच्छी तरह मिल जाते हैं। इससे उनका अपघटन तेज होता है और पौधों के लिए आवश्यक पोषक तत्व अधिक मात्रा में उपलब्ध होते हैं। गहरी जुताई से बनी खुरदरी सतह बारिश के पानी के बहाव को कम करती है और मिट्टी के कटाव को रोकने में मदद करती है। इसके साथ ही ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई लवणीय और क्षारीय मिट्टी के सुधार में भी सहायक हो सकती है। यह हानिकारक लवणों को नीचे की परतों में ले जाने में मदद करती है। सहायक संचालक कृषि रवि आम्रवंशी ने किसानों को गहरी जुताई फायदे के साथ ही इससे होने वाले संभावित नुकसान की भी जानकारी दी है। उन्होंने बताया कि अत्यधिक गहरी जुताई से मिट्टी में रहने वाले लाभकारी सूक्ष्मजीवों और अन्य जीवों को नुकसान पहुंच सकता है। श्री आम्रवंशी के अनुसार बार-बार गहरी जुताई करने से मिट्टी में मौजूद कार्बनिक पदार्थ का ऑक्सीकरण हो सकता है, जिससे उसकी मात्रा कम हो सकती है। गहरी जुताई के लिए अधिक शक्ति वाले ट्रैक्टर और उपकरणों की आवश्यकता होती है, जिससे लागत बढ़ सकती है। यदि जुताई के बाद लंबे समय तक बारिश न हो, तो मिट्टी अधिक सूख सकती है। अनुविभागीय कृषि अधिकारी पाटन डॉ इंदिरा त्रिपाठी ने किसानों से हर तीन साल में खेत की गहरी जुताई करने का आग्रह किया है। उन्होंने बताया कि सामान्य जुताई करने से 15 से 20 सेंटीमीटर तक की मिट्टी पलटती है और उसके नीचे एक कड़ी परत बन जाती है जिससे हवा, पानी और जड़ें नीचे नहीं जा पाती। कृषि अधिकारियों के मुताबिक ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई एक महत्वपूर्ण कृषि क्रिया है। यह मिट्टी के स्वास्थ्य, फसल की उपज और कीट-रोग प्रबंधन में कई तरह से लाभकारी हो सकती है। कृषि अधिकारियों ने किसानों को संभावित नुकसानों को ध्यान में रखते हुए मिट्टी के प्रकार, जलवायु और फसल प्रणाली के अनुसार उचित गहराई और समय पर गहरी जुताई करने की सलाह दी है
