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राष्ट्रीय राजमार्ग 934 भू-अर्जन मुआवजे में भारी अनियमितता का आरोप, हितग्राही पहुँचे न्यायपालिका की शरण में

राष्ट्रीय राजमार्ग-934 (सागर से कबरई तक) की 232.6 किलोमीटर लंबी सड़क परियोजना एक बार फिर विवादों के घेरे में है। इस बार आरोप भू-अर्जन के बाद मुआवजा वितरण में कथित छेड़छाड़ और असमानता को लेकर सामने आए हैं।

⚖️ हितग्राहियों का आरोप – वर्गफुट में खरीदी भूमि का मुआवजा कृषि दरों पर क्यों?

स्थानीय भू-स्वामियों का कहना है कि उन्होंने जिन ज़मीनों को वर्गफुट दरों पर खरीदा था, और जिनके लिए उन्होंने शहरी स्टाम्प ड्यूटी का भुगतान भी किया, उन्हीं भूमि को अब कृषि भूमि मानते हुए मुआवजा दिया जा रहा है।
हितग्राहियों का आरोप है कि यह राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजना की आत्मा के साथ धोखा है।

📃 दस्तावेजों में उल्लिखित ‘आवासीय’, ‘व्यावसायिक’, ‘औद्योगिक’ शब्दों की अनदेखी?

एनएच-934 परियोजना के अधिकृत दस्तावेजों में स्पष्ट रूप से ‘आवासीय’, ‘व्यावसायिक’ और ‘औद्योगिक डायवर्सन’ का उल्लेख है, लेकिन मुआवजा वितरण करते समय इन श्रेणियों को नज़रअंदाज़ कर कृषि दरों पर भुगतान किया गया है।
हितग्राहियों ने इसे “सुनियोजित छल” और “प्रशासनिक स्तर पर भेदभाव” करार दिया है।

⚖️ न्यायपालिका की शरण में हितग्राही, सवाल– 7 वर्ष पूर्व डायवर्सन की अनदेखी क्यों?

विवादित मुआवजा निर्धारण के विरोध में कई भू-स्वामी अब न्यायपालिका का रुख कर चुके हैं। उनका सवाल है कि जब 20-09-2021 के राजपत्र आदेश के सात वर्ष पूर्व ही भूमि का डायवर्सन हो चुका था, तो राजपत्र आदेश की अवमानना क्यों की जा रही है

🤐 प्रशासन की चुप्पी संदेह के घेरे में

इस पूरे प्रकरण में प्रशासन की चुप्पी सवालों को जन्म दे रही है। स्थानीय लोगों का कहना है कि कुछ अधिकारी निजी स्वार्थों के चलते मुआवजा प्रक्रिया को प्रभावित कर रहे हैं।

📢 हितग्राहियों की माँगें –

1. भूमि की वास्तविक स्थिति (आवासीय/व्यावसायिक/औद्योगिक) के अनुसार मुआवजा निर्धारण किया जाए।

2. मूल्यांकन प्रक्रिया पारदर्शी हो।

3. न्यायपालिका की निगरानी में पुनर्मूल्यांकन करवाया जाए।

4. भविष्य में परियोजनाओं में समानता और निष्पक्षता सुनिश्चित की जाए

🔚 यह केवल मुआवजे की नहीं, न्याय की लड़ाई है

हितग्राहियों का कहना है कि यह सिर्फ आर्थिक मुआवजे की नहीं, बल्कि समान अधिकार, न्याय और विश्वास की लड़ाई है। यदि इस मामले का समाधान शीघ्र नहीं हुआ, तो यह असंतोष बड़े आंदोलन का रूप ले सकता है और राष्ट्रीय परियोजनाओं पर आमजन का भरोसा डगमगा सकता है।

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